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शाहिन बाग में चल रहे "पीपली लाइव" के पीछे के एक एक षडयंत्र को उद्घाटित करता प्रभात रंजन दीन का यह आलेख पढिए :--------

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शाहीनबाग षड्यंत्र बुनने वाले शातिरों ने इस बार भारत के संविधान को कुर्बानी का बकरा बनाया है। और शातिर कसाइयों ने संविधान के बर्बर-जिबह को ढंकने के लिए राष्ट्र-ध्वज को पर्दा बनाया है। 

...‘संविधान मुल्ला से कहै, जिबह करत है मोहिं, साहिब लेखा मांगिहैं, संकट परिहैं तोहिं’... यह कबीर और नानक की वाणी है। इसमें मैंने बस ‘मुरगी’ शब्द की जगह संविधान जोड़ दिया है, क्योंकि इस बार कसाइयों ने मुरगी की जगह संविधान को ही चुना है। दिल्ली का शाहीनबाग, पटना का सब्जीबाग, कलकत्ता का पार्क-सर्कस, लखनऊ का घंटाघर या अन्य वो स्थान जहां शातिर कसाई महिलाओं और बच्चों को आगे रख कर घंटा बजा रहे हैं और संविधान को हरी-हरी सब्जियां खिला रहे हैं, उनसे संविधान का तात्पर्य पूछिए... उनसे पूछिए धर्म के नाम पर देश बांटने की घिनौनी करतूत करने के बाद से लेकर आज तक उन्होंने संविधान का कब-कब सम्मान किया..? बस तथ्यों के आधार पर इस सवाल का जवाब दे दें... दूसरे पर कीचड़ उछाल कर अपना मुंह गंदा करने के अलावा ये कुछ नहीं जानते। 

मैं पिछले दिनों शाहीनबाग गया, वहां किस्म-किस्म के लोगों से बातचीत की। दिल्ली से लौट कर फिर मैंने लखनऊ के घंटाघर का जायजा लिया। संविधान को लेकर नारा लगाते कुछ लोगों से घुमा-फिरा कर संविधान के बारे में उनकी जानकारी पूछी... फिर सीएए और एनआरसी का मतलब पूछा... आप यकीन मानिए कि शाहीनबाग से लेकर घंटाघर तक झंडा उठाए और उछल-उछल कर नारा लगाते लोगों को संविधान किस चिड़िया का नाम है, यह नहीं पता। हां, यह जरूर है कि आप किसी से बात कर रहे हों तो कुछ खास चेहरे आपके इर्द-गिर्द घूमने लगेंगे, आपकी निगरानी करने लगेंगे, आपको घूरने लगेंगे ताकि आप बात बंद कर दें। आप दाढ़ी वाले हों तो आप बच सकते हैं, वरना आपको ही उल्टा पूछताछ से गुजरना होगा, जिसमें उनका सबसे बड़ा अहम सवाल होता है, ‘आपका नाम क्या है?’ ...ताकि आपके धर्म का पता चल जाए। मैं सफेद दाढ़ी वाला होने के कारण बचा रहा। कुछ युवकों ने मुझसे यह जरूर पूछा कि ‘क्या आप जर्नलिस्ट हैं?’ 

इन धरनास्थलों पर... नहीं, नहीं, इसे धरनास्थल कहना ठीक नहीं। इन ड्रामास्थलों पर आपको एकधर्मी पत्रकारों की पूरी भीड़ दिखाई देगी। इन पत्रकारों को और कोई काम नहीं। इनका कोई असाइनमेंट नहीं। बस इनका सारा धर्म इन्हीं ड्रामास्थलों पर सिमट आया है। इनका एक ही काम रह गया है, वे भीड़ को बढ़ा-चढ़ा कर दिखने वाले एंगल से फोटो खींचते हैं और उन्हें धड़ाधड़ व्हाट्सएप के तमाम ग्रुपों पर डालते रहते हैं। शाहीनबाग से लेकर तमाम ‘बागों’ तक इनके तगड़े लिंक हैं। आनन-फानन में सारी खबरें और तस्वीरें देशभर से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ईरान तक पहुंच जाती हैं। एकधर्मी पत्रकारों के फोन की जांच हो जाए तो सारी संवैधानिक-प्रतिबद्धता साफ-साफ दिखने लगे। लेकिन सत्ता-प्रतिष्ठान भी तो ऐसे प्रायोजित-नियोजित मेलों को बढ़ावा दे रही है। 

इन प्रायोजित-नियोजित मेलों में इसके अलावा गुरु-गंभीरता ओढ़े खास शक्ल के झोलाछाप मक्कार ‘प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष’ लोगों की जमात भी दिखेगी, जो खास कर महिलाओं के झुंड के बीच गिटपिट-गिटपिट करते मिलेंगे। आगे मिलेंगे भोले-भाले बच्चे जिन्हें सीएए-एनआरसी से क्या मतलब, उन्हें यह मेला मिल गया है, खूब खेलते हैं और मौज करते हैं। जब उनसे नारे लगाने के लिए कहा जाता है, तब उसमें भी उन्हें बहुत मौज आती है। जो महिलाओं की भीड़ है उनमें भी अधिकांश महिलाएं सीधी-सादी गृहणियां हैं... अपने पतियों या पिताओं का हुकुम है और मक्कार ‘प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष’ लोगों की महिला जमात का उकसावा... बैठी हैं घर-बार छोड़ कर। अधिकांश महिलाओं से संविधान को लेकर लग रहे नारों का मतलब पूछिए या उनसे पूछिए सीएए के बारे में तो आपको पता चल जाएगा संविधान के ज्ञान और सम्मान का यथार्थ। रटवाए गए डायलॉग आपको कमोबेश प्रत्येक महिलाओं के मुंह से सुनने को मिल जाएंगे। आप मुस्कुरा कर या झुंझला कर रह जाएंगे। दरअसल शाहीनबाग के शातिरों को महिलाओं और बच्चों को ढाल बनाने की रणनीति माओवादी-नक्सलियों ने सिखाई है। आप यह जानते हैं कि पुलिस से बचने और सुरक्षित भाग निकलने के लिए नक्सली, महिलाओं और बच्चों को आगे कर देते हैं। शाहीनबाग के षड्यंत्रकारी वैसे ही ‘योद्धा’ हैं जो महिलाओं और बच्चों के पीछे दुबके रहते हैं। यही ‘युद्धनीति’ लखनऊ के घंटाघर, पटना के सब्जीबाग और कलकत्ता के पार्क-सर्कस में भी अख्तियार की जा रही है। 

आपने एक बात और गौर की होगी... ड्रामास्थलों पर बाबा साहब अम्बेडकर के पोस्टर भी खूब लगे हुए हैं। बाबा साहब को भी ड्रामेबाजों ने ढाल बना रखा है। ड्रामास्थल पर जमे बैठे एकधर्मी पत्रकारों, पत्रकारों की पूरी भीड़ दिखाई देगी। इन पत्रकारों को और कोई काम नहीं। इनका कोई असाइनमेंट नहीं। बस इनका सारा धर्म इन्हीं ड्रामास्थलों पर सिमट आया है। इनका एक ही काम रह गया है, वे भीड़ को बढ़ा-चढ़ा कर दिखने वाले एंगल से फोटो खींचते हैं और उन्हें धड़ाधड़ व्हाट्सएप के तमाम ग्रुपों पर डालते रहते हैं। शाहीनबाग से लेकर तमाम ‘बागों’ तक इनके तगड़े लिंक हैं। आनन-फानन में सारी खबरें और तस्वीरें देशभर से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ईरान तक पहुंच जाती हैं। एकधर्मी पत्रकारों के फोन की जांच हो जाए तो सारी संवैधानिक-प्रतिबद्धता साफ-साफ दिखने लगे। लेकिन सत्ता-प्रतिष्ठान भी तो ऐसे प्रायोजित-नियोजित मेलों को बढ़ावा दे रही है।
 इन प्रायोजित-नियोजित मेलों में इसके अलावा गुरु-गंभीरता ओढ़े खास शक्ल के झोलाछाप मक्कार ‘प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष’ लोगों की जमात भी दिखेगी, जो खास कर महिलाओं के झुंड के बीच गिटपिट-गिटपिट करते मिलेंगे। आगे मिलेंगे भोले-भाले बच्चे जिन्हें सीएए-एनआरसी से क्या मतलब, उन्हें यह मेला मिल गया है, खूब खेलते हैं और मौज करते हैं। जब उनसे नारे लगाने के लिए कहा जाता है, तब उसमें भी उन्हें बहुत मौज आती है। जो महिलाओं की भीड़ है उनमें भी अधिकांश महिलाएं सीधी-सादी गृहणियां हैं... अपने पतियों या पिताओं का हुकुम है और मक्कार ‘प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष’ लोगों की महिला जमात का उकसावा... बैठी हैं घर-बार छोड़ कर। अधिकांश महिलाओं से संविधान को लेकर लग रहे नारों का मतलब पूछिए या उनसे पूछिए सीएए के बारे में तो आपको पता चल जाएगा संविधान के ज्ञान और सम्मान का यथार्थ। रटवाए गए डायलॉग आपको कमोबेश प्रत्येक महिलाओं के मुंह से सुनने को मिल जाएंगे। आप मुस्कुरा कर या झुंझला कर रह जाएंगे। दरअसल शाहीनबाग के शातिरों को महिलाओं और बच्चों को ढाल बनाने की रणनीति माओवादी-नक्सलियों ने सिखाई है। आप यह जानते हैं कि पुलिस से बचने और सुरक्षित भाग निकलने के लिए नक्सली, महिलाओं और बच्चों को आगे कर देते हैं। शाहीनबाग के षड्यंत्रकारी वैसे ही ‘योद्धा’ हैं जो महिलाओं और बच्चों के पीछे दुबके रहते हैं। यही ‘युद्धनीति’ लखनऊ के घंटाघर, पटना के सब्जीबाग और कलकत्ता के पार्क-सर्कस में भी अख्तियार की जा रही है। 

आपने एक बात और गौर की होगी... ड्रामास्थलों पर बाबा साहब अम्बेडकर के पोस्टर भी खूब लगे हुए हैं। बाबा साहब को भी ड्रामेबाजों ने ढाल बना रखा है। ड्रामास्थल पर जमे बैठे एकधर्मी पत्रकारों, झोलाछाप नस्लदूषित-प्रगतिशीलों और नेताछाप शातिरों से पूछिए संविधान निर्माता बाबा साहब अम्बेडकर के विचार के बारे में... उनका जवाब सुनकर आप इनके चेहरे पर मूर्त रूप से थप्पड़ भले ही न जड़ पाएं, लेकिन एक करारा थप्पड़ रसीद करने का भाव मन में तो जरूर ही आएगा। बाबा साहब अम्बेडकर की दूरदर्शिता, बाबा साहब की विद्वत्ता, बाबा साहब के ज्ञान और उनकी समझदारी पर कोई संदेह है क्या आपको..? नहीं न..? फिर उन्होंने संविधान निर्माण के समय ही संविधान की प्रस्तावना (preamble) में धर्म-निरपेक्ष या पंथ-निरपेक्ष शब्द क्यों नहीं जोड़ा..? कभी सोचा है आपने..? जब धर्म के नाम पर देश को काटा जा रहा हो तो कटे हुए टुकड़े के संविधान में ‘धर्म-निरपेक्ष’ का पैबंद क्यों लगे..? इसीलिए मूल संविधान में यह शब्द संलग्न नहीं है... इसे बाबा साहब ने अपने विचारों में रेखांकित भी किया है। इसीलिए तो उन्होंने संविधान में अनुच्छेद-370 जोड़ कर कश्मीर को ‘दामाद’ बनाने के नेहरू-शेख कुचक्र का विरोध किया था..! बाबा साहब का साफ-साफ मानना था कि इस्लाम के नाम पर देश बांटने के बाद मुसलमानों को भारत में क्यों रहना चाहिए..? लेकिन गांधी-नेहरू दादागीरी के आगे बाबा साहब की एक नहीं चली। खैर, अब मूल बात पर आइए... भारत की संसद ने 1975 में भारत के संविधान में 42वां संशोधन करके ‘पंथ-निरपेक्ष’ शब्द जोड़ा। शाहीनबाग के शातिर इस शब्द के सम्मान का ढाक बजा रहे हैं। ढाक बजाने वाले खुद किसी भी कोण से पंथ-निरपेक्ष नहीं हैं। उनकी कुत्सित मंशा देखिए कि संविधान के इस एक शब्द का तो सम्मान हो... लेकिन जिस संसद ने संविधान में संशोधन करके अनुच्छेद-370 को शिथिल किया, उसके सम्मान की वे धज्जियां उड़ा रहे हैं..! संविधान का यह कैसा सम्मान है..? जिस संसद ने भारत के संविधान के दूसरे भाग के अनुच्छेद-5 से अनुच्छेद-11 तक उल्लिखित नागरिकता से सम्बन्धित प्रावधानों को संशोधित कर नागरिकता संशोधन कानून (सिटिजंस अमेंडमेंड एक्ट) बनाया... उसके सम्मान की वे खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं..! संविधान का यह कैसा सम्मान है..? पूरे देश को बेवकूफ समझते हैं क्या ये ड्रामेबाज..? 

कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की इज्जत और उनका लहू बहाने वालों को, छत्तीसिंहपुरा में सिखों का कत्लेआम करने वालों को, गोधरा में ट्रेन के डिब्बे में बंद कर हिन्दुओं को जिंदा फूंकने वाले अधर्मियों को, अपनी संख्या बढ़ाने और दूसरों की संख्या का संहार करने की विकृत मनोवृत्ति वाले लोगों और उनके साथ खड़ी नस्लदूषित-जमात को पहले खुद को पंथ-निरपेक्ष बनाना होगा। यह समझना होगा कि प्रति-हिंसा हमेशा मूल-हिंसा के बाद आती है... इसीलिए कानून की भाषा में भी मूल-हिंसा को अधिक संगीन माना जाता है। ‘मूल’ को रोकना होगा… ‘प्रति’ पैदा ही नहीं होगा। प्रकृति का नियम है, ‘प्रत्येक क्रिया के बराबर उसी दिशा में विपरीत प्रतिक्रिया होती है’ (for every action (force) in nature there is an equal and opposite reaction)। इस क्रिया और प्रतिक्रिया को रोकना एक व्यक्ति के लिए भी हितकारी है और देश-समाज के लिए भी। भारत के संविधान का समग्र समवेत सम्मान करना होगा। अपनी सुविधा के मुताबिक टुकड़े-टुकड़े में संविधान और कानून का पालन कतई स्वीकार्य नहीं। किसी भी देश के नागरिक के लिए उसका वहां का विधिक (कानूनी) नागरिक होना जरूरी होता है... इस आधार-अनिवार्यता को समझना होगा। कोई भी देश ‘खाला जी का घर’ नहीं होता, जहां जिसे जब चाहे घुस आए, फैल जाए, और संख्या के आधार पर देश मांगने लगे...

रही बात समाचार चैनलों और अखबारों की... उन्हें क्या चाहिए..? उन्हें भी मेला चाहिए। ड्रामास्थल या मेलास्थल देखते ही जिस तरह गोलगप्पे, मूंगफली और गुब्बारे वगैरह बेचने वाले ठेले-खोमचे लग जाते हैं उसी तरह मीडिया के खोमचे लग जाते हैं। आप क्या सोचते हैं कि वे बड़े समझदार लोग हैं..? समझदार होते तो क्या संविधान और देश की समझ उन्हें नहीं होती..? उनकी समझदारी केवल पैसे तक केंद्रित है। समाचार चैनलों को टीआरपी चाहिए और अखबारों को प्रसार-संख्या... पत्रकारिता की यह दोनों दुकानें मुर्दे तक बेच कर खाती हैं। यह तो आप अपने अनुभव से भी जान ही चुके हैं। यह शाहीनबाग पत्रकारों के लिए ‘पीपली लाइव’ है... याद है न आपको वह फिल्म..! बस, आप समझ लीजिए कि शाहीनबाग का मेला मीडिया के लिए ‘पीपली लाइव’ है और इस बार ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ बनाया गया है भारत के संविधान को, जिसे सारे शातिर मिल कर सुसाइड कर लेने के लिए उकसा रहे हैं।

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